शुक्रवार, 10 मार्च 2017
शनिवार, 25 फ़रवरी 2017
दौरे पड़ने की सामान्य चिकित्सा
अपतन्त्रक अर्थात् दौरे पड़ना एक कठिन बीमारी है जो किसी भी अवस्था में किसी भी स्त्री या पुरुष को हो सकती है। ऐलोपैथिक चिकित्सा-पध्दति में इसकी स्थायी चिकित्सा असम्भव नहीं तो काफी कठिन अवश्य है, किन्तु आयुर्वेदीय पध्दति में इसकी कई सफल एवम् निरापद औषधियाँ हैं जिनके नियमित सेवन से इस रोग को समूल नष्ट किया जा सकता है। हम यहाँ इस रोग के लक्षणों सहित कुछ अनुभूत औषधियों का विवरण दे रहे हैं जिनके उपयोग से पीड़ित लोग लाभ उठा सकते हैं।
1- किसी किसी रोगी को दौरा पड़ने का पूर्व संकेत मिल जाता है और रोगी अपने आपको सुरक्षित कर लेता है या सुरक्षित करने का प्रयास करता है, इसके विपरीत किसी किसी को दौरा बिना किसी पूर्व संकेत के पड़ जाता है और रोगी कहीं भी किसी भी अवस्था में अचेत हो जाता है जिससे रोगी को किसी भी प्रकार की हानि पहुँच सकती है।
2- बाज रोगियों की दाँती बँध जाती है, और गले से कई तरह की आवाजें आतीं हैं, हाथ पैर ऐंठ जाते हैं।
3- कुछ रोगियों के मुँह से नीला, काला या सफेद फेन या झाग आता है।
यद्यपि इस रोग के कई असामान्य लक्षण भी हो सकते हैं पर इन्हीं सामान्य लक्षणों से इस रोग को बड़ी सरलता से पहिचाना जा सकता है।
सामान्य चिकित्साः-- दौरे के समय सबसे पहले रोगी के कपड़े ढीले करदें, उसे पर्याप्त हवा मिलने दें, मुँह पर पानी के छींटे दें ।
रोग की प्रारंभिक अवस्था में आयुर्वेद की अपतन्त्रकारि वटी की पूरी उम्र वालों को दो-दो गोली दिन में तीन बार देकर ऊपर से मांस्यादि क्वाथ पिलाएँ तथा भोजनोपरान्त दिन में दो बार 15-15 मिली0 की मात्रा में सारस्वतारिष्ट पिलाएँ। इस दवा का नियमित डेढ़ माह तक सेवन करने से फिर दौरे पड़ने की सम्भावना नहीं रहती। बच्चों को उनकी आयु, बल व भार के अनुसार दवा आधी या चौथाई मात्रा में सेवन कराई जानी चाहिए।
मांस्यादि क्वाथः-- जटामाँसी 20 ग्राम, असगन्ध 5 ग्राम और खुरासानी अजवाइन के बीज 4 ग्राम के अनुपात में लेकर इनका मोटा मोटा (दरदरा) चूर्ण बनाकर रख लें इसमें से रोज सुबह 10 ग्राम दवा लेकर 200 ग्राम जल में 50 ग्राम शेष रहने तक उबालें फिर छान लें यह छना हुआ जल मांस्यादि क्वाथ है इसकी दिन भर के लिए 3 खुराकें बन जाएँगी। अगले दिन फिर नया क्वाथ (काढ़ा) बनाना पड़ेगा।
इस रोग से सम्बन्धित न्य जानकारी के लिए हमारे अगले ब्लॉग देखें या फिर निम्न पते पर सम्पर्क करें या हमें ई मेल करें हमारा ई मेल पता -- premnarayanchaturvedi1@gmail.com.
Contact address -- Prem Narayan Chaturvedi. Villege-- Halupura. P.O. Ludhiyani. Ditt. Etawah.
Mob No. 7017057154.
1- किसी किसी रोगी को दौरा पड़ने का पूर्व संकेत मिल जाता है और रोगी अपने आपको सुरक्षित कर लेता है या सुरक्षित करने का प्रयास करता है, इसके विपरीत किसी किसी को दौरा बिना किसी पूर्व संकेत के पड़ जाता है और रोगी कहीं भी किसी भी अवस्था में अचेत हो जाता है जिससे रोगी को किसी भी प्रकार की हानि पहुँच सकती है।
2- बाज रोगियों की दाँती बँध जाती है, और गले से कई तरह की आवाजें आतीं हैं, हाथ पैर ऐंठ जाते हैं।
3- कुछ रोगियों के मुँह से नीला, काला या सफेद फेन या झाग आता है।
यद्यपि इस रोग के कई असामान्य लक्षण भी हो सकते हैं पर इन्हीं सामान्य लक्षणों से इस रोग को बड़ी सरलता से पहिचाना जा सकता है।
सामान्य चिकित्साः-- दौरे के समय सबसे पहले रोगी के कपड़े ढीले करदें, उसे पर्याप्त हवा मिलने दें, मुँह पर पानी के छींटे दें ।
रोग की प्रारंभिक अवस्था में आयुर्वेद की अपतन्त्रकारि वटी की पूरी उम्र वालों को दो-दो गोली दिन में तीन बार देकर ऊपर से मांस्यादि क्वाथ पिलाएँ तथा भोजनोपरान्त दिन में दो बार 15-15 मिली0 की मात्रा में सारस्वतारिष्ट पिलाएँ। इस दवा का नियमित डेढ़ माह तक सेवन करने से फिर दौरे पड़ने की सम्भावना नहीं रहती। बच्चों को उनकी आयु, बल व भार के अनुसार दवा आधी या चौथाई मात्रा में सेवन कराई जानी चाहिए।
मांस्यादि क्वाथः-- जटामाँसी 20 ग्राम, असगन्ध 5 ग्राम और खुरासानी अजवाइन के बीज 4 ग्राम के अनुपात में लेकर इनका मोटा मोटा (दरदरा) चूर्ण बनाकर रख लें इसमें से रोज सुबह 10 ग्राम दवा लेकर 200 ग्राम जल में 50 ग्राम शेष रहने तक उबालें फिर छान लें यह छना हुआ जल मांस्यादि क्वाथ है इसकी दिन भर के लिए 3 खुराकें बन जाएँगी। अगले दिन फिर नया क्वाथ (काढ़ा) बनाना पड़ेगा।
इस रोग से सम्बन्धित न्य जानकारी के लिए हमारे अगले ब्लॉग देखें या फिर निम्न पते पर सम्पर्क करें या हमें ई मेल करें हमारा ई मेल पता -- premnarayanchaturvedi1@gmail.com.
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